अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल बनें


 

अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल बनें



अगर समाज में संरचनात्मक  बदलाव लाना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल बनना पड़ेगा । अपने बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए बच्चों के समक्ष कोई ऐसा काम नहीं करना है, जिनसे उनके दिमाग में नेगेटिव छाप पड़े। बच्चों का पहला पाठशाला घर से ही शुरु होता है और पहला  शिक्षक मां बाप और परिवार के अन्य सदस्य होते हैं। बच्चों में देखकर सीखने की क्षमता सबसे अधिक होती है। बच्चों में अच्छे और बुरे की फर्क नहीं होती है । उनके सामने जो कुछ भी हो रहा होता है उनको बड़े गौर से देख रहे होते हैं । बच्चों के संस्कार या आदत बिल्डिंग में हम अभिभावकों का बहुत बड़ा हाथ होता है। क्योंकि जैसा हम बच्चों को माहौल और परिवेश देंगे बच्चे वैसे ही होंगे। यदि हम में कोई गंदी आदत होगी तो निश्चित तौर से वही आदत कालांतर में हमारे बच्चों में परिलक्षित होगी। बच्चों के द्वारा अर्जित संस्कार हमारे संस्कारों का ही आइना होता है। गलत आदतों का चक्र अपने आपको तब तक दोहराते रहता है जब तक उसे तोड़ा ना जाए। उदाहरण के लिए मान लीजिए। 


मेरे दादा (2nd) जी ने अपने पिता(1st)को दारु पीते हुए देखा होगा। नशा पान गलत चीज है, इसका बोध होने से पहले ही दादाजी ने पीना सीख लिया होगा। दादाजी को देखकर मेरे पिता (3rd) सीख गया और फिर मैं (4th) । यह तो पक्का है कि मुझे देखकर मेरा बच्चा (5th)  भी सीख ही जाएगा । इसी तरह से यह कुचक्र बदस्तूर बिना रुके चलता रहेगा । वर्तमान में फिलहाल हम हैं ।और यह सब हम पर निर्भर करता है कि इस चक्र को यहीं पर तोड़कर रोक दें या फिर इसको आगे लेकर चलें। इनकी निरंतरता से यह बात निकलकर सामने आती है कि किसी ने भी इसको रोकने की तबीयत से कोशिश नहीं की , जिस तरह से कोशिश करनी चाहिए थी। शायद कोशिश की भी होगी लेकिन खुद नशा पान लेते रहे और दूसरे को ना करने का प्रवचन देते रहे। मतलब साफ है दूसरों को सुधारने से पहले खुद को सुधरना होगा ।

और ऐसा बात बिल्कुल भी नहीं है कि अच्छी आदतों का चक्र नहीं होता। अच्छी आदतों का भी चक्र होता है। खिलाड़ी का बेटा ज्यादातर मामलों में खिलाड़ी ही बनता है। सैनिक का बेटा सैनिक ही होता है। अगर कोई नेता है तो उसकी भरसक कोशिश होती है कि टिकट उन्हीं के बेटे या बेटी को मिले। किसान का बेटा किसान ही बनेंगे ज्यादातर मामलों में। डॉक्टर भी यही चाहेगा कि उसका बेटा डॉक्टर ही बने। आप ही नेता का बेटा अभिनेता ही बनेगा।  यह भी तो एक चक्र ही है साहब। और ऐसा हो भी क्यों ना। प्रत्येक अभिभावक को अपने बच्चों के कैरियर के बारे में सोचना चाहिए। प्रत्येक अभिभावक यही चाह होती है कि उनके बच्चे का लाईफ सिक्योर हो। डॉक्टर का बेटा डॉक्टर इसीलिए बन पाता है क्योंकि बचपन से ही उसके घर में उनको उस तरह का माहौल मिलता है। कहने का मतलब है आप इकाई को ठीक कीजिए दहाई खुद ब खुद ठीक हो जाएगा।


सही मायने में अगर देखा जाए तो संरचनात्मक और क्रियात्मक सामाजिक बदलाव का पहला कार्य क्षेत्र अपना घर ही होता है। पहला सीढ़ी अपने बच्चों का  सही परवरिश करना है। परिवार एक यूनिट होता है और जिसका संचालन हम खुद करते हैं। 

नैतिक मूल्यों से अवगत कराएं

अपने बच्चों को संस्कारवान बनाना हमारी नैतिक जिम्मेवारी होती है। उन्हें यह बात अवश्य सिखाएं कि बड़ो और छोटों से किस तरह का व्यवहार करना चाहिए। जब हम किसी से मिलते हैं तो अभिवादन स्वरूप नमस्ते, नमस्कार, प्रणाम, जय धर्म, गुड मॉर्निंग, गुड आफ्टरनून बोलते हैं की जानकारी अवश्य दें। बड़ों का आदर करना और छोटों को स्नेह करना सिखाएं। तमिज़ और तहज़ीब से रूबरू कराएं। इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर हम एक संस्कारवान समाज का निर्माण कर सकते हैं।

बच्चों को अनुशासित बनाएं

हम सभी जानते हैं कि जीवन में अनुशासन का क्या महत्व है? अनुशासन के बिना हमारा जीवन अव्यवस्थित हो जाता है। अपने बच्चों में अनुशासन की आदत बचपन में ही डालनी चाहिए। समय का पाबंद बनाइए। प्रत्येक काम को करने का एक उचित समय होता है, की जानकारी दें। समय पर उठना ,समय पर नहाना, समय पर खाना, समय पर स्कूल जाना, समय पर खेलना और समय पर पढ़ाई और सोने की आदत विकसित करें। इससे होगा क्या कि हम एक अनुशासित समाज का निर्माण कर सकते हैं।

अपने बच्चों को एडल्ट्री से दूर रखें

अपने बच्चों को वैसे टीवी प्रोग्रामों या वेब सीरीज से दूर रखें जिसमें अश्लील कंटेंट परोसी जाती हों। बच्चों को मूवी दिखानी हो तो पहले यह अवश्य जांच लें कि movie U certificate ,U/A certificate या A certificate वाला है। बच्चों के लिए restricted movies कभी ना दिखाएं।इनकी जानकारी रहना हमारी नैतिक जिम्मेवारी हैं।  बच्चों के इंटरनेट सर्फिंग पर नज़र अवश्य रखें। तब कहीं जाकर समाज को एडल्ट्रेशन से दूर रखना संभव हो पाएगा।

बच्चों को सुपरविजन में रखें


जहां तक संभव हो सके अपने बच्चों पर एक जासूस की तरह नजर अवश्य रखें। कोशिश ये करें कि उनके हर एक गतिविधि की जानकारी हो सके।क्या कर रहा है? कहां जा रहा है ? कौन कौन उसके दोस्त है ? दोस्त कैसे हैं ? नहीं चाहते हुए भी आपको इसकी जानकारी रखनी पड़ेगी। ये हमारे बच्चों के बेहतरी के लिए जरूरी भी है। अनदेखा करने पर क्या क्या हो सकता है हम सबको पता है। 

अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से ना करें


अक्सर देखा ये जाता हैं कि हम दूसरों के बच्चे को देखकर, दूसरों के बच्चों के जैसा ही अपेक्षा ,अपने बच्चों से करते हैं । और हम यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक बच्चा अपने आप में स्पेशल होता है । हर बच्चे की अपनी एक अलग खूबी होती हैं। कोई पढ़ाई में ठीक होता है। कोई खेल कूद में ठीक होता है। कोई गाता अच्छा है ।कोई नाचता अच्छा है और कोई बोलने में बड़ा चतुर है।  टैलेंट को पहचानें और उसी को तराशें।



अपना सपना बच्चों पर ना थोपें

 बहुत बार ऐसे देखने को मिलता है कि हम अपने जीवन में किसी कारणवश अपना लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने बच्चों पर ज़ोर लगाते हैं। हम चाहते हैं कि जो काम हमसे ना हो पाया वो हमारे बच्चे करें। इसको लेकर के हम उनको फॉर्सफुली सिखाने या समझाने का कोशिश करते हैं। डर और नीरसता  के कारण बच्चे कोई भी काम को ढंग से नहीं कर पाते हैं। सभी रुचिकर काम छूट जाते हैं। अगर उनसे अच्छे परिणाम की उम्मीद करते हैं तो उन्हें फ़्री छोड़ दें। सिर्फ मार्गदर्शन करें।

नशीली पदार्थों के उपयोग से बचें

चुकी परिवार का माहौल बच्चों के सीखने के लिए बहुत बड़ा स्कूल होता है। इसीलिए बच्चों के सामने या घर में कभी भी मादक पदार्थों का इस्तेमाल से बचें। मादक पदार्थों के दुषपरिणामों से बच्चों को अवश्य अवगत कराएं।  मादक पदार्थों का उपयोग करने वाले परिवारों के बच्चे ज्यादातर मामलों में जल्दी सीख जाते हैं। क्योंकि माहौल उन्हें घर में ही मिल जाता है। नशा मुक्त समाज के निर्माण के लिए प्रत्येक इंडिविजुअल को पहल करने की जरूरत है।

बच्चों के मन की जिज्ञासा को शांत करें

बच्चे बहुत ही चंचल और जिज्ञासु प्रवृति के होते हैं। हर चीज को बड़े ही कौतूहलता के साथ देखते हैं। बच्चों से ज्यादा जिज्ञासु शायद ही कोई होता है। हर अनजान चीज के बारे में जानना चाहते हैं। हर अनजान चीज के बारे में बहुत ज्यादा क्वेशचन करते हैं। और यह क्वेश्चन क्या-क्या होते हैं हम सबको पता है। यहीं पर हमें बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। बच्चा समझ कर हमें उल्टा पुल्टा, गोल मटोल  या आतार्किक उत्तर देने से बचना चाहिए। क्योंकि बच्चा तो नादान होता है ।उन्हें कुछ भी पता नहीं होता।  हमारे द्वारा बताए गए उत्तर को ही वह सच समझ बैठता है । यही चीजें उसके दिमाग में घर कर जाती है। फिर इन्हीं बातों को बच्चा अपने दोस्तों को कहता है। अपने शिक्षकों को कहता है ।और रिश्तेदारों से कहता है। बच्चों का हर सवाल का जवाब बिल्कुल सही सही देना चाहिए। इसके लिए हमें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।हमें पढ़ना भी पड़ेगा । दोस्तों से भी पता करनी पड़ेगी। बच्चों के कुछ कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिसका जवाब समय उन्हें समय आने पर खुद ही दे देता है। 

टीवी प्रोग्राम उनके सच्चाई को बताएं


हमारे सभी बच्चों को टीवी देखना बहुत पसंद होता है। विशेषकर कार्टून और सुपर हीरो से संबंधित प्रोग्राम। बच्चे उन्हें के पहनावा, उनके हाव-भाव और उनके एक्शन को कॉपी करना चाहते हैं। कई एक बार बहुत बड़ा नुकसान हो जाता है। बच्चे बहुत मासूम और भोले होते हैं उन्हें सच्चाई क्या होता है उन्हें पता नहीं होता।  यहां हमारी जिम्मेवारी बनती है कि बच्चे को इसके बारे में समझाएं । सच्चाई क्या है उन्हें बताएं। 

हाईजीन और सैनिटेशन 

बच्चों में हाइजीन और सेनिटेशन से संबंधित आदतें विकसित करें। साफ सफाई के इम्पोर्टेंस के बारे में समझाएं। परिवेश को साफ कैसे रखा जाए उसके बारे में समझाएं। सेल्फ हाइजीन क्या होती है के बारे में भी समझाएं। कलर कोडेड bins के बारे में समझाएं और बताएं कि कौन सा कचरा कहां डालना है।

बच्चों को घर का काम अवश्य सीखाएं

हम में से अधिकतर घरों में ये होता है कि लाड़ प्यार के चक्कर में अपने बच्चों को कोई भी घरेलू काम नहीं सीखा पाते। विशेषकर लड़कों को। हमें अपने बच्चों को छोटी छोटी घरेलू कामों को अवश्य सिखानी चाहिए। जैसे कि घर को साफ सुथरा रखना। पौधों में पानी देना। सब्जी काटना। कपड़े धोना। खाना बनाना जैसे कि चाय, कॉफी और मैग्गी आदि। क्योंकि कभी ना कभी बच्चों को घर में या बाहर पढ़ाई के दौरान इन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जिनको घरेलू काम बिल्कुल भी नहीं आता। अतः बच्चों को आत्मा निर्भर बनाना बहुत ही जरूरी है।




अन्य बातें

  • बच्चों के सामने सेक्सुअल एक्टिविटी से बचें। 
  • बच्चों को सेक्स एजुकेशन की जानकारी अवश्य दें।
  •  बच्चों के सामने कभी भी गंदी गंदी बातों का प्रयोग ना करें।
  • गंदी बातों के साथ बच्चों को कभी भी संबोधित ना करें।
  • बच्चों को गुड टच और बैड टच के बारे में अवश्य बताएं। 
  • बच्चों को धर्म और संस्कृति के बारे में अवश्य जानकारी दें। बच्चों को सैद्धांतिक धार्मिकता के बारे में बताएं। बच्चों को अंधभक्त ना बनाएं। 
  • बच्चों को सहिष्णु और शालीन बनाएं जिद्दी और उदंड कभी ना बनाएं।
  • बच्चों को पैसों के इम्पोर्टेंस के बारे में समझाएं।
  • कोशिश करें कि बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से दूर रखें।
  • खेल कूद और स्वास्थ्य संबंधी आदतें विकसित करें।
  • पर्यावरण और प्रकृति से संबंधित जानकारी दें।
  • पेड़ पौधा लगाना सिखाए।
  • खाने पीने की अच्छी आदतें विकसित करें।

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धन्यवाद

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टिप्पणियाँ

Unknown ने कहा…
बार-बार समझने के वावजुद बात न सुने उन्हें कैसे हैंडिल करना चाहिए ?? Plz rply,

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