फास्टिंग सैंपल को लेकर लोग कई ग़लतफ़हमियाँ रखते हैं। कई लोग सोचते हैं कि फास्टिंग का मतलब पानी भी न पीना, जबकि सादा पानी पीया जा सकता है। रात का खाना छोड़ना ज़रूरी नहीं, बस 8–12 घंटे का गैप रखना होता है। ज़्यादा देर उपवास करने से रिपोर्ट अच्छी नहीं बल्कि ग़लत हो सकती है। हर टेस्ट में फास्टिंग ज़रूरी नहीं, जैसे CBC, LFT, KFT, थायरॉइड आदि बिना फास्टिंग भी हो सकते हैं, जबकि ब्लड शुगर और लिपिड प्रोफ़ाइल में ज़रूरी है। लोग मानते हैं कि चाय/कॉफ़ी से फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यह भी रिपोर्ट असर डाल सकती है। दवा भी बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेनी चाहिए क्योंकि कई दवाएँ रिपोर्ट बदल देती हैं। टेस्ट के बाद तुरंत भारी खाना खाने से भी परेशानी हो सकती है, इसलिए हल्का संतुलित नाश्ता लेना सही है। और अक्सर यह भी समझा जाता है कि फास्टिंग सैंपल का मतलब सिर्फ़ सुबह का सैंपल होता है, जबकि सच्चाई यह है कि दिन के किसी भी समय 8–12 घंटे का उपवास पूरा करने के बाद सैंपल लिया जाए तो वह फास्टिंग सैंपल कहलाता है।
परिचय: तकनीकी युग में बच्चों का बचपन आज का युग डिजिटल क्रांति का है, जहां तकनीक ने हमारे जीवन के हर हिस्से को बदल कर रख दिया है। बच्चे, जो कभी अपने बचपन में खेल के मैदानों में दौड़ते, दोस्तों के साथ खेलते और प्राकृतिक वातावरण में रोज कुछ नया सीखने में गुजारते थे, अब ज्यादातर समय मोबाइल स्क्रीन या TV स्क्रीन के सामने गुजर रहा है। मोबाइल फोन, जो कभी वयस्कों का साधन हुआ करता था, अब बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। चाहे वह ऑनलाइन गेम हो, वीडियो देखने का शौक हो, या सोशल मीडिया का छोटे- छोटे रीलस् । बच्चों की दुनिया अब मोबाइल के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। हालांकि, यह तकनीक ज्ञान और मनोरंजन के नए रास्ते खोल भी रही है, लेकिन इसके साथ ही यह बच्चों के मासूम बचपन को धीरे-धीरे निगल रही है। डिजिटल लत न केवल उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर प्रभाव डाल रही है, बल्कि उनके सामाजिक जीवन और व्यवहार पर भी गहरा असर डाल रही है। इस लेख में हम मोबाइल की इस दुनिया में खोते बचपन को समझने का प्रयास करेंगे, और इस डिजिटल लत से बच्चों को कैसे बचाया जा सकता है, इस पर चर्चा करेंगे। खेल का मैदा...
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