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अच्छे कामों को आसान और बुरे कामों को मुश्किल बनाएं

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  Past, वर्तमान का आधार होता है। प्रत्येक मनुष्य का वर्तमान स्थिति उनके द्वारा जीवन में लिए गए सही या गलत फैसलों का समुच्चय होता है। हमारा भूतकाल वर्तमान का आधार होता है। हमारे जितनी भी फ़ैसले होते हैं सभी कहीं ना कहीं पहले किये गया कार्यों से प्रेरित होता है। हमारे द्वारा किये गए हर एक अच्छा काम नेक्स्ट अच्छा काम को कंटिन्यू करने को प्रेरित करता है। हमारे द्वारा किये गए बुरे काम बुरा काम को जारी रखने को प्रेरित करता है।मतलब साफ है ।आज अच्छा करोगे तो कल अच्छा होगा और आज बुरा करोगे तो कल बुरा होगा।  अगर कोई मनुष्य महीने का 10000 रुपए कमाता है। इसका मतलब है कि वह उतना ही कमाने के लायक है। अगर उसमें ज्यादा काबिलियत होगी तो  वह अपना earnings को भी बढ़ा लेगा। otherwise fixed रहेगी या फिर कम होती जाएगी।हमारे द्वारा अर्जित धन हमारी काबिलियत का पैमाना होता है। हमारी वर्तमान स्थिति हमारी  (past )भूतकाल की कार्य प्रणाली की जानकारी देता है। हमारी earnings भी हमारे योग्यता के हिसाब से कम या ज्यादा हो सकता है। यह पूर्ण रूपेण हम पर निर्भर करता है। हम मनुष्य की फितरत होती है कि किस तरह से कम मेहनत कर

अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल बनें

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  अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल बनें अगर समाज में संरचनात्मक  बदलाव लाना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल बनना पड़ेगा । अपने बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए बच्चों के समक्ष कोई ऐसा काम नहीं करना है, जिनसे उनके दिमाग में नेगेटिव छाप पड़े। बच्चों का पहला पाठशाला घर से ही शुरु होता है और पहला  शिक्षक मां बाप और परिवार के अन्य सदस्य होते हैं। बच्चों में देखकर सीखने की क्षमता सबसे अधिक होती है। बच्चों में अच्छे और बुरे की फर्क नहीं होती है । उनके सामने जो कुछ भी हो रहा होता है उनको बड़े गौर से देख रहे होते हैं । बच्चों के संस्कार या आदत बिल्डिंग में हम अभिभावकों का बहुत बड़ा हाथ होता है। क्योंकि जैसा हम बच्चों को माहौल और परिवेश देंगे बच्चे वैसे ही होंगे। यदि हम में कोई गंदी आदत होगी तो निश्चित तौर से वही आदत कालांतर में हमारे बच्चों में परिलक्षित होगी। बच्चों के द्वारा अर्जित संस्कार हमारे संस्कारों का ही आइना होता है। गलत आदतों का चक्र अपने आपको तब तक दोहराते रहता है जब तक उसे तोड़ा ना जाए। उदाहरण के लिए मान लीजिए।  मेरे दादा (2nd) जी ने अपने पिता(1st)को दारु पीते हुए देखा

सामाजिक नशाखोरी एक बुराई(III)

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सामाजिक नशाखोरी के दुष्प्रभाव सामाजिक नशखोरी के पहले और दूसरे अध्याय में "नशाखोरी क्या है इसकी शुरुआत कैसे होती है ? लत क्या है? और लत की पहचान कैसे होती है? के बारे विस्तृत जानकारी प्राप्त की।  तीसरे अध्याय में इसके दुष्प्रभाव के बारे में जानेंगे। उत्पादकता में कमी चुकी लगातार नशीली पदार्थों के प्रयोग करने से हमारे  शारीरिक स्वास्थ्य पर इसका  बूरा असर पड़ता है। कहा भी जाता है ना स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। सोचने समझने की शक्ति कम होने लगती है। हमारे क्रिएटिविटी का इस पर डायरेक्ट असर पड़ता है। जिस काम के लिए लोग हमें अप्रोच किया करते थे , दूर होते चले जाते हैं।  क्योंकि उन्हें पता होता है कि एक शराबी आदमी कभी भी 100 परसेंट dedication और concentration के साथ में काम नहीं कर सकता। एक शराबी आदमी का कार्य करने का दायरा सीमित होने लगता है।  लड़ाई झगड़ा एक शराबी व्यक्ति शराब पीने के बाद में एक अलग ही दुनिया में रहता है। बहुत ही ज्यादा सेंटिमेंटल(sentimental) और सेंसिटिव (sensitive)हो जाता है। हमारे साथ बीती हुई सभी घटनाएं आज के ही दिन याद आने लगती है। छोटी-छोटी  बा

सामाजिक नशाखोरी(II)

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लत क्या है और इसकी पहचान क्या है? सामाजिक  नशाखोरी के अध्याय एक में हमने नशाखोरी के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करी और साथ ये भी जाना कि नशाखोरी की शुरुवात कैसे होती है। दूसरे अध्याय में  लत क्या होती है और लत की पहचान कैसे करें इसके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। लत के तो अनेकों रूप है । लेकिन यहां नशा के कारण उत्पन्न लत की बातें करेंगे। नशीली पदार्थों  के लगातार उपयोग के कारण हमारे मस्तिष्क के न्यूरोलॉजिकल पैटर्न में ऐसे बदलाव , जो नशीली पदार्थों के उपयोग पर हमारा नियंत्रण समाप्त कर देता है। ऐसी बात भी नहीं, कि नशा, बहुआयामी बर्बादी का कारण बनता है उसकी जानकारी हमें नहीं है। इसका दुष्परिणाम हमारे शरीर में दिखने भी लगता। इसके अलावा हमारे पारिवारिक रिश्ते, आर्थिक स्थिति और कामकाज में भी असर पड़ने लगता है। साफ शब्दों में कहें तो नशा पर अपना सेल्फ कंट्रोल खत्म हो जाता हैं। नशाखोरी के दलदल में दिन-प्रतिदिन हमारा पैर धसते चला जाता हैं। सब कुछ पता होने के बावजूद हम असहाय और लाचार महसूस करते हैं। ऐसी अवस्था को ही लत/व्यसन कहा जाता है। लत एक्चुअली और कुछ नहीं, हमारे द्वारा नशाखोरी

सामाजिक नशाखोरी(I)

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नशाखोरी समाज के लिए अभिशाप है।  नशाखोरी एक सामाजिक बुराई है। इसके गिरप्त में बच्चे ,युवा और बुजुर्ग सभी हैं। भारत युवाओं का देश है। युवाओं का संलिप्तता इसमें सबसे ज्यादा है। युवा शक्ति का इससे प्रभावित होना, समाज या देश के उत्पादकता में कमी होना है। सामाजिक स्तर से पूरा देश नशाखोरी जैसे मानसिक बीमारी से पीड़ित है। समाज और देश के लिए यह एक अभिशाप से कम नहीं है। अल्कोहल पेय पदार्थों का (विस्की, चुलैया ,महुआ ,ब्रांडी, बीयर और हंडिया  आदि अल्कोहोल पेय पदार्थ है ) लगातार ज्यादा मात्रा में consumption को ही नशाखोरी कहा जाता है।हमारे समाज को नशा की लत लग चुकी हैं।  नशा नाश करता है। नशा आप किसी भी रूप में लें हमेशा बर्बादी का कारण ही बनता है। ये बर्बादी बहुआयामी होता है।हमारी उत्पादकता पर सीधा असर पड़ता है। शारीरिक, मानसिक ,आर्थिक और सामाजिक इन सभी क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।  सबसे ताज्जुब की बात यह है कि बियर और हड़िया(राइस वियर) को हम शराब की श्रेणी में रखते ही नहीं। अजीबों गरीब तर्क देकर इसको लेने को जस्टिफिकेशन करते हैं। मैं आपको बता दूं की यह भी अल्कोहल पेय पदार्थ

समस्या प्रोग्रामिंग में होती है, प्रिंटआउट में नहीं

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  यह चार आयामी  दुनिया क्या है ? कैसे यह एक दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं ? मै समझाने की कोशिश करूंगा।  यह चार आयामी दुनिया है भौतिक जगत, मानसिक जगत भावनात्मक जगत और आध्यात्मिक जगत। लेकिन हम रहते सिर्फ एक जगत में वह है भौतिक जगत। बाकी तीनों जगह हमारे अंदर की दुनिया है। भौतिक दुनिया में हमारी हालात कैसे हैं,यह डिपेंड करता है हमारी आंतरिक दुनिया पर। हम कभी यह समझ ही नहीं पाते कि भौतिक दुनिया हमारी आंतरिक दुनिया की प्रिंटआउट मात्र है।  चलिए इसको हम एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। मान लीजिए हम अपने कंप्यूटर पर एक चिट्ठी टाइप करी। प्रिंट बटन दबाकर उसका प्रिंट आउट भी निकाल लिया। प्रिंट आउट निकालने के बाद पता चला कि इसमें एक गलती हुई है। चलिए हम देखते हैं कि जीवन में हुई गलतियों के प्रकृति को समझे बिना ही हल करने की कैसी कैसी कोशिशें करते हैं ? कोई भरोसेमंद इरेज़र ले करके प्रिंटआउट में हुई गलती को मिटा देते हैं। प्रिंट बटन दबाकर दोबारा प्रिंट आउट निकाल लेते हैं। इस बार फिर से गलती जस का तस है, कोई सुधार नहीं हुआ। फिर हम सोचते हैं कि इसको तो अभी हमने मिटाया था, फिर मिटा क्यों नहीं? फिर

जैसा जड़ वैसा फल

 कल्पना कीजिए कि जीवन एक पेड़ है।पेड़ में लगे फल की तुलना उस परिणाम से कीजिए जिसको कि हमने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों में प्राप्त किया है। इस फल को लेकर हमारी अक्सर यह शिकायत रहती है कि फल कम है, हमें और मिलना चाहिए था, आकार में भी काफी छोटा है , स्वाद भी कुछ खास नहीं है। अक्सर हम ऊपर देखने वाली फल की ही चर्चा करते हैं और यह हमेशा भूल जाते हैं कि फल तो बीज और जड़ों के कारण उत्पन्न होती है। जो की जमीन के नीचे दबी हुई होती है, दिखाई नहीं पड़ती। कहने का मतलब साफ है कि अगर गुणवत्तापूर्ण दिखाई देने वाली फल की चाह रखते हैं,तो सबसे पहले दिखाई नहीं देने वाली बीज और जड़ के बेहतरी के लिए काम करना होगा ।फल तो अपने आप ही उनके मुताबिक बदल जाएगा। हम अक्सर दिखाई देने वाली चीजों को ही सच मान बैठते हैं जो कि बिल्कुल ही गलत है। जो चीजें हमें दिखाई नहीं देती उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर देते हैं। मै कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगा। बिजली हमें दिखाई नहीं देती है। लेकिन उसके शक्ति के बारे में हम सभी परिचित हैं और हम बिल भी पे करते हैं। किसी चुंबक की चुम्बकीय शक्ति हमें दिखाई नहीं देती लेकिन उसी अदृश